सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: 498A और दहेज उत्पीड़न के मामले में पति को दी गई सजा को किया गया रद्द




फैसले की विस्तृत समीक्षा 

मामला: Rajesh Chaddha v. State of Uttar Pradesh
निर्णय दिनांक: 13 मई 2025
न्यायाधीश: जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा
प्रकरण: आपराधिक विशेष अनुमति याचिका [SLP(Crl) No. 2353-54/2019]


मामले की पृष्ठभूमि:

राजेश चड्ढा और शिकायतकर्ता माला चड्ढा की शादी फरवरी 1997 में हुई थी। विवाह के पश्चात मात्र 12 दिन की सह-वास अवधि के बाद दोनों में मतभेद उत्पन्न हो गए। दिसंबर 1999 में पत्नी द्वारा 498A IPC, 323, 506 IPC और दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं में शिकायत दर्ज कराई गई, जिसमें पति व उसके परिवार पर मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न, गर्भपात और दहेज की मांग के आरोप लगाए गए।


ट्रायल कोर्ट व हाई कोर्ट का फैसला:

  • मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ ने वर्ष 2004 में राजेश चड्ढा को 498A IPC व धारा 4 दहेज अधिनियम के तहत दोषी ठहराया, जबकि शारीरिक चोटों (323 IPC) और डराने-धमकाने (506 IPC) के आरोप सिद्ध नहीं हुए।

  • अपर सत्र न्यायालय और इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस दोषसिद्धि को बरकरार रखा।


सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और निर्णय:

1. सबूतों की कमी:

  • कोर्ट ने पाया कि पीड़िता और उसके पिता की गवाही के अतिरिक्त कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं था।

  • गर्भपात और शारीरिक चोटों के आरोपों की पुष्टि हेतु कोई चिकित्सीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए।

2. अस्पष्ट और सामान्य आरोप:

  • आरोप अस्पष्ट और तिथियों व घटनाओं के बिना थे, जिससे विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न हुआ।

3. वैवाहिक जीवन की अवधि और तलाक:

  • दोनों पक्षों में पहले ही तलाक हो चुका है जो कभी चुनौती नहीं दिया गया।

4. दुरुपयोग की चेतावनी:

  • कोर्ट ने 498A और दहेज अधिनियम के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि "सिर्फ रिश्तेदारों के नाम डाल देना" कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।


फैसला:

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

  • “498A और धारा 4, दहेज अधिनियम के तहत आरोप बिना ठोस सबूतों के साबित नहीं हुए।”

  • ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा दिया गया दोषसिद्धि का आदेश निरस्त किया जाता है।

  • राजेश चड्ढा को सभी आरोपों से बरी किया जाता है।


महत्वपूर्ण संदेश:

यह फैसला इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वैवाहिक विवादों में दंडात्मक धाराओं का अंधाधुंध और अस्पष्ट उपयोग न्यायिक प्रणाली का दुरुपयोग है। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक विवेक और निष्पक्ष साक्ष्य के आधार पर न्याय देने का उदाहरण प्रस्तुत किया है।



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